इक उम्मीद भरी उडान

मैं उडना चाहती हुंँ इक उम्मीद भरी उडान से 
मैं लडना चाहती हुँ इस बेबूनियादि सामाज से

हर वक्त हैं यहीं ख्वाब मेरे
करना है सच इन्हें 
न रह जाऐ ख्वाब से
ख्वाब के टूट जाने से डर लगता है 
डर लगता है अपनी हार से

मैं उडना चाहती हुँ इक उम्मीद भरी उडान से 
मैं लडना चाहती हुँ इस बेबूनियादि सामाज से

आज नहीं तो कल, रह जाना है अकेले मुझे
तुम मानौ या ना मानो 
यहा तो सिर्फ हिम्मत है लोगों की ज़ूबान से
ज़ूबान का यह सच नहीं 
न यह सच है उन अलफाजौं का

हाँ, मैं उडना चाहती हुँ इक उम्मीद भरी उडान से 
मैं लडना चाहती हुँ इस बेबूनियादि सामाज से 

सूनते बहुत हैं, 
जब आऐ दुनिया में अकेले , तो जाना भी अकेले है 
पर ,यहां बात आने-जान की नहीं 
यहां सब करना भी अकेले है 
साथी बहुत मिल जाते हैं 
मिल जाते हैं लोग अफसाने से

मैं उडना चाहती हुँ इक उम्मीद भरी उडान से 
मैं लडना चाहती हुँ इस बेबूनियादि सामाज से 

हर हाल में  है पार करना 
हर मन्ज़र इस सामाज का
कहीं अपनौ की उम्मीदों का
तो कहीं ज़हर उगलने वाले  सांप का
जानती हुँ, रोकेंगे मूझे लाख बार
तोडेंगे मुझे बार-बार
पर है हिम्मत मुझमे

कि मैं उडना चाहती हुँ इक उम्मीद भरी उडान से 
मैं लडना चाहती हुँ इस बेबूनियादि सामाज से 

-रश्मि पठानिया

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